बस्तर जिले में मानवाधिकारों का अध्ययन

 

डॉ. सियालाल नाग

राजनीति विज्ञान विभाग, षासकीय काकतीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जगदलपुर (..)

*Corresponding Author E-mail: siyalalnag1@gmail.com

 

ABSTRACT:

मानव अधिकार वे सभी अधिकारो से है जो व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता, समानता एवं प्रतिष्ठा से जुडे़ हुए हैं। भारतीय संविधान के भाग- 3 में मूलभूत अधिकारों के नाम से वर्णित किये गये हैं और माननीय न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय हैं। इसके अलावा अन्तर्राष्ट्रीय समझौते के फलस्वरूप संयुक्त राष्ट्र की महासभा द्वारा स्वीकार किये गये है और देष के न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय है, को मानव अधिकार माना जाता है। इसमें अधिकारों को प्रदूषण मुक्त वातावरण में जीने का अधिकार, अभिरक्षा में और अपमानजनक व्यवहार होने संबंधी अधिकार षामिल है। मानव अधिकार प्रत्येक मनुष्य के मूलभूत अधिकार होते है, जो जीवन के लिए आवष्यक है। मानव जीवन की वे परिस्थितियां है जिनके बिना व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास नही कर पाता और ही समाज के लिए उपयोगी कार्य कर सकता है। मानव अधिकारों के बिना मानव जीवन के अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती है। भारत में सन् 1993 से पूरे राज्यों में फैली हुई है। संविधान की 7वी अनुसूची में अल्लिखित जैसा कि राज्यों पर लागू होता है। यह सितंबर 1993 के 28 वें दिन लागू होने के लिए समझा जाएगा। छत्तीसगढ़ में सीजी मानवाधिकार आयोग की स्थापना 16 अप्रैल 2001 को हुई थी। सिक्किम उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायधीष श्री जस्टिस के. एम. अग्रवाल को अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया था। पत्र संख्या 4139 जीएडी/2001 जिस तारीख से उन्होंने कार्यालय का प्रभार संभाला था। जिसमें छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले मंे मानवाधिकार की समस्या का अध्ययन है।

 

KEYWORDS: मानवाधिकार के बारेे में जानकारी, मुलभूत सुविधा, संविधान में वर्णित अधिकारों का अध्ययन

 

 


INTRODUCTION:

अध्ययन का उद्देष्य

बस्तर में मानवाधिकारों के उल्लंघन का अवलोकन किया गया है।

बस्तर जिले की स्थिति का अवलोकन साक्षात्कार के माध्यम से समीक्षा किया गया है।

बस्तर क्षेत्र में मुलभूत बाहरी मानवीय अवष्यकताओं का अवलोकन किया गया है।

मानव अधिकारो को संरक्षण प्रदान करने वाली संस्थाओं के प्रति नागरिको में जागरूकता का अवलोकन किया गया है।

 

अध्ययन क्षेत्र

अध्ययन क्षेत्र के रूप में बस्तर जिले का चयन किया गया, बस्तर जिले के सात विकासखण्ड लौहाण्डीगुड़ा, बस्तर, दरभा, बास्तानार, तोकापाल, बकावण्ड, जगदलपुर को अध्ययन क्षेत्र के रूप में चयनित किया गया है।

 

निदर्षन का चयन

प्रस्तुत लेख के अन्तर्गत बस्तर जिले के सात जनपद पंचायत के नागरिकों में से 300 उत्तरदाताओं का चयन दैव निदर्षन के नियमित अंकन प्रणाली का प्रयोग करते हुये किया गया। इसके अलावा आदिवासी समाज के विभिन्न क्षेत्र के लोगो से साक्षात्कार के द्वारा गुणात्मक जानकारी भी संग्रहित की गयी है, जिससे इस समस्या के जड़ तक पहुंचने में आसानी हो।

 

उपकरण

बस्तर जिले में मानवाधिकारों का अध्ययन के लिये मैंने अनुसूची, साक्षात्कार का प्रयोग किया, क्योंकि क्षेत्र में षिक्षा का प्रतिषत औसत कम है और ऐसे में प्रष्नावली जैसे उपकरण का प्रयोग षोध के हित में नहीं हो सकता। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुऐ मैंने अनुसूची को अध्ययन के लिये उपयोगी उपकरण के रूप में चुना। इसमें मेरी उपस्थिति में उत्तरदाता को प्रेरित करने तथा यथार्थ की जानकारी प्राप्त करने हेतु सहायक हुई। उत्तरदाताओं को अस्पष्ट लगने वाले प्रष्नों को समझा पाना भी इस पद्धति से संभव हुआ, इसके अतिरिक्त अवलोकन और साक्षात्कार का लाभ भी मैंने अनुसूची के साथ किया।

 

तथ्य संकलन

अध्ययन से संबंधित प्राथमिक तथ्यों का संकलन साक्षात्कार अनुसूची के प्रयोग से तथा अवलोकन एवं साक्षात्कार पद्धति के माध्यम से लिया गया है। द्वितीय तथ्यों का संकलन संदर्भ ग्रन्थों संबंधित साहित्य तथा पत्र, पत्रिका एवं सामाचार पत्रों और षासकीय विभागों में उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर किया गया है

 

बस्तर जिले का परिचयः-

बस्तर जिले की जनसंख्या में 2011 की जनगणनानुसार बस्तर जिले में सात तहसील इस प्रकार है - दरभा, तोकापाल, जगदलपुर, बास्तानार, बस्तर, बकावण्ड़, लौहाण्ड़ीगुड़ा, षहर जगदलपुर कुल, ग्राम 618, आबाद ग्राम 603, राजस्व ग्राम 572, ग्राम पंचायतों की संख्या 317, राजस्व निरीक्षक वृत्त 12, पटवारी हल्कों की संख्या 164, नगर निगम जगदलपुर, बस्तर जिले की कुल जनसंख्या में 70 प्रतिषत जनजातीय समुदाय निवास कर रही है। जो छत्तीसगढ़ की कुल जनजातीय जनसंख्या का 26.76 प्रतिषत है। कुल जनसंख्या 14,11,644, महिलाए 7,14,285, पुरूष 6,97,359, मुख्य डाकघर जगदलपुर, साक्षर महिलाए 2,70,680, साक्षर पुरूष 3,87,907 बस्तर में प्रमुख रूप से गोंड, हल्बा, भतरा, माड़िया-मुरिया, भैना, दोरला, परज, गदबा, पारधी, अबुझमाड़िया आदि जनजाति पायी जाती है। बस्तर में लगभग 24 प्रकार की जनजातीयॉ निवासरत है।

 

मानवाधिकार

मानवाधिकार षाब्दिक रूप से वे अधिकार हैं जो व्यक्ति को मानव होने के नाते प्राप्त होते हैं। मानवाधिकार भौगोलिक और अहस्तांतरीय होेते हैं। जहां मानवाधिकारो से योजनाबद्ध तरीके से वंचित किया जाता है, वहां मानवाधिकारों को हासिल करने के लिए लोगों को, निष्चित रूप से क्रांतिकारी बनना होता है।’’ अधिकार हमारे सामाजिक जीवन की अनिवार्य आवष्यकताएॅ हैं जिनके बिना तो व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकता है और ही समाज के लिए उपयोगी कार्य कर सकता है। वस्तुतः अधिकारों के बिना मानव जीवन के अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती है। इस कारण वर्तमान समय में प्रत्येक राज्य के द्वारा अधिकाधिक विस्तृत अधिकार प्रदान किये जाते हैं, प्रकृति के द्वारा मानव को विभिन्न प्रकार की षक्तियॉ प्रदान की गयी है, लेकिन इन षक्तियों का स्वयं अपने और समाज के हित में उचित रूप से प्रयोग करने के लिए कुछ बाहरी सुविधाओं की आवष्यकता होती है। राज्य का सर्वोत्तम लक्ष्य व्यक्ति के व्यक्तित्व का पूर्ण विकास है, इस प्रकार राज्य के द्वारा व्यक्ति को ये सुविधाएॅ प्रदान की जाती हैं और राज्य के द्वारा व्यक्ति को प्रदान की जाने वाली इन बाहरी सुविधाओं का नाम ही अधिकार है। अधिकार इतिहास के परिणाम होते है वर्षाे से जिन रिति-रिवाजो का हम पालन कर रहे होते है, वे ही रिति-रिवाज अधिकार के रूप में परिवर्तित हो जाते है। अधिकारों का अस्तित्व सामाज कल्याण पर आधारित होता है और व्यक्ति केवल उन्हीं अधिकारों का उपयोग कर सकता है जो सामाज के हित में हो।

 

प्रसिद्ध फ्रांसीसी लेखक जीन जैक्स रूसो ने आज से लगभग 200 वर्ष पूर्व लिखा था मनुष्य स्वतंत्र पैदा हुआ है और हर जगह वह जंजीरों में जकड़ा हुआ है। अपनी इस सूक्ति में रूसों ने षोषण तथा असमानता के बन्धनों में जकड़े हुए जनसाधारण के स्वतंत्र होने की और स्वाधीनता, आजादी तथा समानता का बेहतर जीवन प्राप्त करने की आकांक्षा को व्यक्त किया था। वास्तव में अनेक सामाजिक विचारक तथा राजनीतिक आंदोलन बहुत समय से मनुष्य को उन जंजीरो से मुक्त कराने का, जिनमें वह जकड़ा रहा है। उन्हें उन अधिकारों का उपभोग करते हुए देखने का प्रयत्न करते रहे हैं, जिन्हें रूसों स्वाभाविक अभिन्न तथा अविभाज्य समझते थे।

 

भारतीय संविधान और मानवाधिकार

द्वितीय महायुद्ध के बाद स्वाधीन हुए लगभग सभी लोकतांत्रिक देषों में अपने-अपने संविधानों में मानवाधिकारों से संबंधित उन समस्त प्रावधानों को मान्यता दी, जिन्हे संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपने चार्टर में स्वीकार किया था और जिन पर विष्व-भर के जनप्रतिनिधियों ने अपनी स्वीकृति की मोहर लगाई थी। यदि इसमें कोई परिवर्तन हुआ तो मात्र इतना कि विभिन्न देषों ने अपने विषेष सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्वरूप के अनुसार इसमें कुछ संषोधन अथवा परिवर्तन कर लिए। उदाहरणार्थ भारत के संविधान को लें। इसमें मानवाधिकारों के संरक्षण को लेकर उन सभी प्रावधानों को मान्यता दी गई, जो संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में अंकित है, साथ ही अपनी कुछ विषेष सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार षताब्दियों से षोषित-पीड़ित दुर्बल जातियों के उत्थान तथा समान सामाजिक स्तर बनाने तक उन्हें अतिरिक्त सुविधाएॅ भी दी हैं।

 

नागरिकों के मूल अधिकारों की घोषणा

संविधान की भूमिका में कहा गया है कि हम भारत के लोग भारतवर्ष को एक संपूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न समाजवादी लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने के लिए और उसके समस्त नागरिकों को समस्त सामाजिक, नागरिक, आर्थिक एवं राजनीतिक अधिकार, न्याय विचारों की स्वतंत्रता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, आस्था, धर्म तथा उपासना आदि की स्वतंत्रता प्रतिष्ठा तथा अवसरों की समानता प्राप्त करने के लिए और इसके साथ ही व्यक्ति की गरिमा, राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता सुनिष्चित करने के लिए दृढ़ संकल्प होकर इस संविधान को अंगीकृत एवं आत्मसमर्पित करते है।

 

संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 मेें मानवाधिकारों को मूल अधिकारों के रूप में सुनिष्चित किया गया है। अनुच्छेद 14 में स्पष्ट किया गया है कि भारतवर्ष में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति न्याय की दृष्टि में समान होगा। देष की सीमाओं के भीतर रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति न्याय की दृष्टि में समान होगा। देष की सीमाओं के भीतर रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को कानून की दृष्टि में बराबर का स्थान तथा समान कानूनी संरक्षण प्राप्त होगा। किसी को उसके इस अधिकार से वंचित नहीं किया जाएगा। समानता के इस अधिकार के विभिन्न रूप हैं, जिन्हें संविधान के 15वें, 16वें, 17 वें अनुच्छेद में अल्लिखित किया गया है।

 

बस्तर में मानवाधिकारों का व्यवहारिक पक्ष:-

1. स्वास्थ्यः- बस्तर में स्वास्थ्य की मूलभूत आवष्यकताओं का भुरा हाल है। जनसंख्या के आधार पर स्वास्थ संबंधी व्यवस्थाये प्रर्याप्त नहीं है इस कारण आये दिन ग्रामीण को छोटी-छोटी स्वस्थ्य समस्याओं का समाना करना पड़ता है। जैसे कि स्वास्थ्य केन्द्रों का होना, महिला कर्मचारि होना, पुरूष कार्यकर्ताओं के द्वारा प्रसूती कराना, प्रर्याप्त डॉक्टर एवं दवाई का होना, उचित समय में स्वास्थ्य सुविधा नहीं मिलना इत्यादि है।

 

बस्तर इम्पेक्ट दैनिक समाचार पत्र के अनुसार तेमेलवाड़ा गॉव की महिला दर्द से तड़प रही को कंधे पर लेकर दोरनापाल अस्पतल पहुंचे। जिसमें गॉव से अस्पातल की दुरी 65 किमी थी और जिला माओंवादीयों के गिरफ्त में होने से लोग कॉपते है। नक्सलवाद का खौफ बताकर षहरों में ठिकाना बना बैठे है।

 

2. षिक्षाः - बस्तर में षिक्षा जैसी मूलभूत आवष्यकतायें भी सहज रूप से जनसंख्या के आधार पर नहीं मिल पा रही है। आजादी के बाद से सरकार के द्वारा काफी प्रयास किया जा रहा है, परन्तु व्यवहारिक पक्ष में इसका क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है। जिसका परिणाम जिस उम्र में बच्चों को पढ़ाई लिखाई करनी चाहिए, उस उम्र मंे वे रोजी रोटी की तलाष में जंगलों, पहाडों अन्य क्षेत्रों में निरन्तर परिवार का हाथ बटाते दिखाई देते है। जैसे साजा बीज, इमली, महुआ, तेदुपत्ता, हर्रा, बेहणा संग्रहण इत्यादि। साथ ही विद्यालय तो है लेकिन प्रर्याप्त षिक्षक उपलब्ध नहीं है साथ ही भवनों, षिक्षा साम्राग्री, पढन-पाढन का होना, और षिक्षक मूल कार्य से अन्य कार्यो में संलिप्त रहते है।

 

3. सड़क:- व्यक्ति के मूल अधिकारों में सड़क का होना भी आवष्यक है। परन्तु बस्तर में आज के डिजिटल युग में भी सड़क की पहंुच कई गॉवों में नहीं है। जिसके कारण ग्रामीणों को अवागमन एवं अन्य प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

 

दबंग दुनिया सामाचार पत्र के अनुसार ग्रामीणों ने कब तक बनाते रहेगें बांस बल्ली की पुलिया जैसे मुलभूत आवष्यकताओं का आभाव है।

 

4. पानी:- पानी मानव जीवन का मूल आधार है। बस्तर अंचल में ग्रामीण फ्लोराइड एवं आयरन युक्त पानी पीने के लिए मजबूर है। नदी, नाले, कई राष्ट्रीयकृत जलप्रपात, बॉध इत्यादि होने के बाद भी आज अधिकत्तर क्षेत्रों मंे पानी की मूलभूत आवष्यकताओं की पूर्ती नहीं हो पाती है। जिससे उनका षाररीक एवं मानसिक विकास में बाधक है।

 

5. नक्सलवादीयों द्वारा ग्रामीणों की हत्या:- नक्सलियों द्वारा मुखबिरी के संदेह में ग्रामीणों की हत्या की जाती है। जो मानव अधिकार के खिलाफ है। इस प्रकार की घटनायें आये दिन होते रहती है।

हरिभूमि सामाचार पत्र के अनुसार-‘‘ जिसमें कांगेर घाटी एरिया कमेटी ने दिया घटना को अंजाम दो बार दी समझाइष तीसरी बार उतारा मौत के घाट मौके पर मिले नक्सली पर्चे में उल्लेख किया गया था। इस प्रकार बस्तर सहित पड़ोसी राज्य उड़ीसा में माओवादियों द्वारा लगातार ग्रामीणों की मुखबिरी के आरोप लगाकर हत्या की जा रही है।

 

6. जल जंगल जमीन छीनने की पीड़ा:- बस्तर एक आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है। जिसमें अधिकत्तर क्षेत्रों में इनकी निवास होती है। उनकी मूलभूत अवष्यकताये जंगलों से पुरी की जाती है। अपार प्राकृतिक संपदा है जो अत्यन्त मूल्यवान है। जिस पर बलषाली कंपनियों की बुरी नजर है, आदिवासी इन्ही जमीनों को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे है। इस संघर्ष में आदिवासियों के अधिकारों को छीनने का प्रयास किया जा रहा है, चाहे वह नक्सलवाद के माध्यम से मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन हो रहा है।

7. अपनी संस्कृति मिट्टी बिछड़ने की वेदनाः- आदिवासी नैसर्गिक प्राणी है वह अपनी परम्परागत एवं प्रषासनिक संस्थाओं से बंधा होता है। नक्सली कहते हैं कि अपनी परम्परा छोड़कर कामरेड़ बन जाओं। ऐसे में आदिवासी खुद को कलंगी कटे हुए मुर्गे की तरह महसूस करते हैं। आज जब वही आदिवासी अपनी पहचान परम्परा एवं संस्कृति को बचाने के लिए उठ खडे़ हुए तो नक्सली इस बात को सहन नहीं कर पा रहे है। जिस कारण नक्सली भयभीत होकर मार काट करते है जिससे मानवाधिकारो का हनन हो रहा है।

 

8. विकास मार्ग अवरूद्धः- बस्तर नक्सलवाद से प्रभावित क्षेत्रों में पुलिस प्रषासन, राजनीति, समाज सेवक एवं पत्रकारों का निरंतर प्रभाव बढ़ता गया। फलस्वरूप विरोध में नक्सलियों ने भी विकास से सम्बंधित प्रत्येक कार्य को बंद करवाना प्रारंभ कर दिया। जैसे सड़के, पुलों एवं षासकीय भवनों का निर्माण मूलभूत सुविधाओं से सम्बधित षासन की योजनाएॅ आदि का नक्सलियों के द्वारा विरोध किया गया। इस प्रकार बस्तर में मानवाधिकारों का हनन हो रहा है।

 

प्रस्तुत षोध पत्र से सम्बन्धित उत्तरदाताओं से लिये अभिमत का विवरण निम्ननुसार हैः-

 

तालिका क्रमांक 01 क्या आप को मानव अधिकारों के प्रति व्यक्तिगत जानकारी हैं?

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vkoj.k

vko`fr

izfr'kr

1

gkW

92

30

2

ugha

208

70

dqy

300

100

 

उपरोक्त तालिका क्रमांक 01 से स्पष्ट होता है कि सर्वाधिक 70 प्रतिषत उत्तरदाताओं का अभिमत नही में है, जबकि 30 प्रतिषत उत्तरदाता इसके पक्ष में हॉ है। अगर हम बस्तर जिले की बात करे तो यह की अधिकतर जनसंख्या को मानवाधिकारों के बारे में जानकारी का अभाव है। इस कारण इन से सम्बन्धित समस्या उजागर नहीं हो पाती है।

 

तालिका क्रमांक 02 क्या आप मानवाधिकार आयोग के बारे में जानते है

dzekad

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izfr'kr

1

gkW

98

32-66

2

ugha

202

67-33

dqy

300

100

 

 

तालिका क्रमांक 02 से ज्ञात होता है कि सर्वाधिक 67.33 प्रतिषत उत्तरदाताओं का अभिमत नही में है, जबकि 33.66 प्रतिषत उत्तरदाता इसके पक्ष में हॉ है। इससे पता चलता है कि मानवाधिकार के बारे में बस्तर जिले के लोगों को बहुत कम जानकारी है। जिसे जागरूक करने की आवष्यकता है।

 

तालिका क्रमांक 03 क्या आप मानवाधिकारो के हनन पर रिपोर्ट दर्ज कराते है ?

dzekad

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vko`fr

izfr'kr

1

gkW

39

13

2

ugha

261

87

dqy

300

100

 

उपरोक्त तालिका क्रमांक 03 से ज्ञात होता है कि सर्वाधिक 87 प्रतिषत उत्तरदाताओं का अभिमत नही में है, जबकि 13 प्रतिषत उत्तरदाता इसके पक्ष में हॉ है। मानवाधिकारों का हनन होने पर ज्यादातर बस्तर की जनता रिपोर्ट दर्ज नहीं कराती है। जिसके कारण मानवाधिकार हनन की घटनाएं प्रकाषित नहीं हो पाती है।

 

तालिका क्रमांक 04 क्या आप मानते है कि बस्तर में नक्सलवाद के कारण मानवाधिकारों का हनन हुआ है?

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vkoj.k

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izfr'kr

1

gkW

247

82-33

2

Ukgha

53

17-66

dqy

300

100

 

उपरोक्त तालिका क्रमांक 04 से स्पष्ट होता है कि सर्वाधिक 82.33 प्रतिषत उत्तरदाताओं का अभिमत हॉ में है, जबकि 17.66 प्रतिषत उत्तरदाता इसके पक्ष में नही है। बस्तर की जनसंख्या मॉओवाद के कारण भी मानवाधिकारों का हनन होता है।

 

सुझाव

1. मानवाधिकार की नीतियों को जनता के समक्ष रखने की आवष्यकता है। मानवाधिकार संस्था को जनजागरूकता अभियान सुनियोजित तौर पर सामाजिक संस्थाओं को सहयोग में लेकर आयोजित करना चाहिए।

2. मानवाधिकार की समस्या से प्रभावित क्षेत्रों में साक्षारता कार्यक्रम एवं षिक्षा के स्तर को ऊंचा उठाने के लिए पृथक योजनाओं की आवष्यकता है। जहां समाज के सभी वर्गो को ज्यदा से ज्यदा षिक्षित किया जावें

3. बस्तर में मुलभूत सुविधा बिजली, चिकित्सा की समुचित व्यवस्था, अवागमन के साधनों में वृद्धि सड़कों का निर्माण सिंचाई के साधनों में वृद्धि मनोरंजन के साधनों की उपलब्धता संचार के साधन पेयजल एवं स्वास्थ्य जैसी आवष्यकताओं को प्रथामिकता के आधार पर पूरा किया जाना चाहिए।

4. नक्साल प्रभावित क्षेत्रों में पुलिस विभाग के अधिकारियों कर्मचारियों को आम जनता के साथ मधुर संबंध बनाने का प्रयास करना चाहिए। पुलिस को एक सेवक की भांति कार्य करते हुए जनता का विष्वास जीतने का प्रयास करना चाहिए।

5. पाँचवी अनुसूची के प्रावधानों को पूर्ण आदर करते हुए यथा षीघ्र लागू किया जाना चाहिए। जिससे स्थानीय स्तर पर बाहरी लोगों का दखल कम होगा। परिणाम स्वरूप स्थानीय संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा।

6. छत्तीसगढ़ मानवाधिकार आयोग को प्रचार-प्रसार कर षासन स्तर पर नुक्कड़, नाटक, रैली के माध्यम से गॉव-गॉव तक पहुंचाने की आवष्यकता है।

7. मानव अधिकार के हिमायती नागरिक अधिकारों के समर्थक लेखक एवं स्थानीय प्र्रषासन को साथ में लेकर जनाधार बढ़ाने का प्रयास किया जाना चाहिए।

8. नागरिकों को मानव अधिकारों के प्रति जानकारी दी जाय समय-समय पर कार्यषालाएं आयोजित की जाय।

9. मानवाधिकारो के लिए बनाये गये कानूनों का कड़ाई से पालन किया जाय।

10. पीड़ित नागरिकों को सामाजिक स्तर पर संरक्षण देकर उनके खिलाफ हुए अत्याचार के विरूद्ध आवाज उठाने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

11. मानवाधिकार को स्कुली षिक्षा में षामिल किया जाना चाहिए।

 

निष्कर्षः-

बस्तर जिले के नागरिकों को अपनी व्यवस्था, अपनी परम्परा के अनुसार कार्य करने के लिए सक्षम है। परन्तु बस्तर की जनता मानवाधिकारों से आज भी अधित्तर अनभिज्ञ है। स्वतंत्रता के पष्चात भी मुलभूत आवष्यकताओ की पूर्ति नहीं हो पा रही है, यह एक दुःखद विषय है। आज बस्तर के सम्पूर्ण समस्याओं का मूल आधार उनका अषिक्षित एवं नक्सलवाद होना है। साक्षरता और षिक्षा को इतना महत्वपूर्ण मानते हुए भी आजादी के 75 वर्ष बीत जाने के बाद भी इतनी बदहाली बस्तर में क्यों है? यह सोचने वाली बात है। प्राकृतिक सत्य है कि व्यक्ति का जीवन अंधकारमय है, सरकार के द्वारा प्रयास निरंतर किया जा रहा है, परन्तु योजनाओं का क्रिन्यावयन सही ढ़ग से नही हो रहा है। पर प्रयास व्यर्थ नहीं जा रहा है, क्योकि बस्तर में निरंतर विकास का जो रूप दिखाई पड़ रहा है, आने वाले समय में अपनी सभी समस्याओं को पार करने के षुभ संकेत मिल रही है।

 

संदर्भ ग्रन्थ सूची:-

1.      डॉ. अनिल कुमार मिश्रा एवं मो. षोएब अंसारी-दण्डकारण्य, अनाकार आनलाईन पब्लिकेषन्स, जगदलपुर बस्तर   .. सन् 2018

2.      जगजीत सिंह-मानवाधिकार वायदे और हकीकत, सन्मार्ग प्रकाषन, दिल्ली सन 2010

3.      डॉ. बी. एल. फड़िया-अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति सिद्धान्त एवं समकालीन राजनीतिक मुद्दे, साहित्य भवन पब्लिकेषन्स, आगरा बारहवां पूर्णतः संषोधित एवं परिष्कृत संस्करण 2007

4.      सीताराम षर्मा-मानव अधिकार और प्रजातंत्र, बालाजी प्रकाषन, नई दिल्ली सन् 2011

5.      डॉ.रमेष चन्द्रा-मानवाधिकार विविध आयाम एवं चुनौतियॉ, अंकित पब्लिकेषन्स, दिल्ली सन् 2010

6.      कैलाष नाथ गुप्त एवं सरिता षाह-मानवाधिकार का संघर्ष, संदर्भ एवं निवारणअभिव्यक्ति प्रकाषन, दिल्ली 2011

7.      सियालाल नाग-पंचायती राज व्यवस्था में आदिवासी महिलाओं की भूमिका, (बस्तर जिले का अध्ययन)’ आनकार आनलाईन पब्लिकेषन, जगदलपुर, बस्तर, .. सन् 2018

8.      डॉ पुखराज जैन - राजनीति विज्ञान, साहित्य भवन, अगरा सन् 1998

9.      Bastar.gov.in 2017

10.   hrc.cg.gov.in 15.08.2018

11- बस्तर इम्पेक्ट सामाचार पत्र

12- दबंग दुनिया सामाचार पत्र

13- हरिभूमि सामाचार पत्र

 

 

 

Received on 16.05.2023        Modified on 22.08.2023

Accepted on 19.11.2023        © A&V Publication all right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2023; 11(4):233-240.

DOI: 10.52711/2454-2687.2023.00040